क्या नए किरायेदार कानून में मकान या दुकान खाली करना होगा नामुमकिन?

किराये पर नियंत्रण रखने वाले नियम भारत में आजादी से पहले साल 1914 और 1945 में लागू हुए थे, जो वक्त से साथ काफी पुराने हो चुके हैं।

इसलिए 2 साल पहले केंद्र सरकार ने किरायेदारी अधिनियम, 2015 का एक ड्राफ्ट मॉडल पेश किया था जो अब कानून में तब्दील हो चुका है। यह कानून अब जल्द ही दिल्ली में लागू हो जायेगा।

आइए जानते हैं इस कानून कि कुछ मुख्य बातें ।

सिक्योरिटी डिपॉजिट की वापसी:

इस ड्राफ्ट के मुताबिक किराए का तीन गुना सिक्योरिटी डिपॉजिट लेना तब तक गैर-कानूनी होगा, जब तक इसका अग्रीमेंट न बनवाया गया हो।

किरायेदार के घर खाली करने पर मकानमालिक को एक महीने के भीतर यह रकम लौटानी होगी।

रेनोवेशन के बाद किराया बढ़ाना:

ड्राफ्ट में कहा गया है कि बिल्डिंग के ढांचे की देखभाल के लिए किरायेदार और मकानमालिक दोनों ही जिम्मेदार होंगे। अगर मकानमालिक ढांचे में कुछ सुधार कराता है तो उसे रेनोवेशन का काम खत्म होने के एक महीने बाद किराया बढ़ाने की इजाजत होगी।

हालांकि इसके लिए किरायेदार की सलाह भी ली जाएगी। दूसरी ओर, रेंट अग्रीमेंट लागू होने के बाद अगर बिल्डिंग का ढांचा खराब हो रहा है और मकानमालिक रेनोवेट कराने की स्थिति में नहीं है तो किरायेदार किराया कम करने को कह सकता है। किसी भी झगड़े की स्थिति में किरायेदार रेंट अथॉरिटी से संपर्क कर सकता है।

बिना बताए नहीं आ सकता मकानमालिक:
परिसर के मुआयने, रिपेयर से जुड़े काम या किसी दूसरे मकसद से आने के लिए भी मकानमालिक को 24 घंटों का लिखित नोटिस एडवांस में देना होगा।

किराया न देने पर निकालना:

रेंट अग्रीमेंट में लिखी अवधि से पहले किरायेदार को तब तक नहीं निकाला जा सकता, जब तक उसने लगातार कई महीनों तक किराया न दिया हो या वह प्रॉपर्टी का दुरुपयोग कर रहा हो। अगर रेंट अग्रीमेंट खत्म होने के बाद भी वह मकान खाली नहीं कर रहा है तो मकानमालिक को दुगना मासिक किराया मांगने का अधिकार है।

नोटिस पीरियड: किरायेदार के लिए यह जरूरी है कि वह घर छोड़ने से पहले मकान मालिक को एक महीने का नोटिस दे।

इसका भी रखें ध्यान: बतौर किरायेदार आप किराये के मकान को बिना अपने मकानमालिक की इजाजत के किराये पर किसी और को नहीं दे सकते।

किरायेदार की मौत होने पर: रेंट अग्रीमेंट के दौरान अगर किरायेदार की मौत हो जाए तो? इसके लिए ड्राफ्ट में कहा गया है कि अग्रीमेंट उसकी मौत के साथ ही खत्म हो जाएगा। लेकिन अगर उसके साथ परिवार भी है तो किरायेदार के अधिकार उसकी पत्नी या बच्चों के पास चले जाएंगे।

सिविल कोर्ट नहीं करेगा सुनवाई:

ड्राफ्ट में केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों से कहा गया है कि वह किराया विवाद निपटाने वाली अदालतों, प्राधिकरण या अधिकरण का गठन करें। यह संस्थाएं सिर्फ मकानमालिक और किरायेदारों के विवादों का निपटारा करेंगी।

इसका मतलब है कि आप किराये से संबंधित विवाद निपटाने के लिए सिविल अदालतों का रुख नहीं कर सकते।

ये नहीं हैं शामिल: ड्राफ्ट के प्रावधान सरकारी, शैक्षिक, कंपनियों, धार्मिक और चैरिटेबल संस्थाओं की इमारतों पर लागू नहीं होंगे।

Dr Ajay Kummar Pandey
Advocate & Consultant
BestBrain Consultancy Grp.
4C Supreme Law International
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